سنو ایشور - نظم از کپل جوشی
جموں و کشمیر کے ایک علاقے کٹھوا میں ایک نابالغ لڑکی کی عصمت ریزی اور پھر اس کے قتل پر ملک بھر میں احتجاج کی لہر جاری ہے۔ اس احتجاج کا ایک حصہ قلمکار بھی بنے ہیں۔ اسی المناک واقعے کے پس منظر میں راجستھان کے ایک چھوٹے سے گاؤں کے شاعر کپل جوشی نے اپنی نظم "سنو ایشور" تحریر کی ہے۔ نظم کا اردو ترجمہ (از: مکرم نیاز) ذیل میں ملاحظہ فرمائیں۔۔۔
| سنو ایشور! | सुनो ईश्वर |
| تم گونگے ہو یا بہرے ہو؟ | तुम गूंगे हो या बहरे हो? |
| سن نہیں پاتے کچھ بھی | सुन नहीं पाते कुछ भी |
| دور کا، نزدیک کا بھی | दूर का,नजदीक का भी |
| تمہارے ہی ایک مندر میں | तुम्हारे ही एक मंदिर में |
| چیختی چلاتی رہی | चीखती चिल्लाती रही |
| ایک معصوم بچی | एक मासूम बच्ची |
| اور تم تھے کہ | और तुम थे कि |
| بیٹھے رہے مندر کی ٹھنڈی چھاؤں میں | बैठे रहे मंदिर की ठंडी छाँव में |
| اور لیتے رہے | और लेते रहे |
| مزہ چھپن (56) ذائقوں کا | स्वाद छप्पन भोगों का |
| . | . |
| سنو ایشور! | सुनो ईश्वर |
| میں نے سنا تھا کہ | मैंने सुना था कि |
| تم رحم دل ہو | तुम दयालू हो |
| دوڑے چلے آتے ہو | दौड़े चले आते हो |
| اپنے بچوں کی ایک پکار پر | अपने बच्चों की एक पुकार पर |
| لمحہ بھر میں | क्षण भर में , |
| اور ہر دکھ درد سے چھٹکارہ دلا دیتے ہیں | और उबार लेते है हर दुःख-दर्द से |
| کیا یہ سچ نہیں ہے؟ | क्या ये सच नहीं है? |
| . | . |
| سنو ایشور! | सुनो ईश्वर |
| میں نے سنا ہے اپنی دادی سے | मैंने सुना है अपनी दादी से |
| تم آئے تھے بھری سبھا میں | तुम आये थे भरी सभा में |
| دروپدی کی ایک پکار پر | द्रोपदी की एक पुकार पर |
| اور بچائی تھی حیا | और बचाई थी लाज |
| اس بھری سبھا میں | उस भरी सभा में |
| میں نے پڑھا ہے دھرم کی موٹی کتابوں میں | मैंने पढ़ा है धर्म की मोटी किताबों में |
| تم آئے تھے ہر زمانے میں | तुम आये थे हर युग में |
| رامائن، مہابھارت، دواپرا یگ (1) میں | रामायण ,महाभारत ,द्वापरयुग में |
| اور میں نے یہ بھی پڑھا ہے | और मैंने ये भी पढ़ा है |
| تمہی نے کہا تھا کہ | तुम्ही ने कहा था कि |
| میں آتا ہوں | मैं आता हूँ |
| ہر یگ میں | हर युग में |
| جب جب ہوتی ہے دھرم کی توہین | जब-जब होती है धर्म की क्षति |
| بدکاری کا فروغ ہو | अधर्म का विस्तार होता है, |
| کیا یہ محض کہا سنی کے دلاسے تھے؟ | क्या ये महज कहना भर था?? |
| . | . |
| سنو ایشور! | सुनो ईश्वर |
| میں نے سنا ہے شروع سے ہی | मैंने सुना है शुरू से ही |
| بچوں میں بھگوان بستے ہیں | बच्चों में भगवान बसते है |
| مگر اُس دن جب وہ | मगर उस दिन जब वो |
| بلکتی رہی تھی مندر کے احاطے میں | बिलखती रही थी मंदिर के परिसर में |
| لگاتی رہی تھی پکار بار بار تمہارے لوٹ آنے کی | लगाती रही थी गुहार बार -बार तुम्हारे लौट आने की |
| کیا اُس دن تم چھٹی پر تھے؟ | क्या उस दिन तुम छुट्टी पर थे?? |
| . | . |
| سنو ایشور! | सुनो ईश्वर |
| اب بہت ہوئی خاموشی | अब बहुत हुई चुप्पी |
| نہیں برداشت ہوتا اب | नहीं सहन होती अब |
| یہ آخری درخواست ہے تم سے | ये आख़िरी दरख़्वास्त है तुमसे |
| ایک ناچیز شاعر کی | एक छोटे कवि की |
| اگر اس بار بھی رہی خاموشی | अगर इस बार भी रही चुप्पी |
| تو میں بھی | तो मैं भी |
| مسترد کر دوں گا | नकार ही दूँगा |
| تمہیں | तुम्हें |
| اور | और |
| تمہاری الہی طاقت!! | तुम्हारी ईश्वरीय सत्ता! |
1: سنسکرت تعلیمات کے مطابق دنیا کے چار ادوار ہیں، ستیہ یگ، تریتا یگ، دواپرا یگ اور کل یگ۔
A Hindi poem 'Suno Eeshwar' by Kapil Joshi
Urdu Translation: Mukarram Niyaz.
Urdu Translation: Mukarram Niyaz.

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